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यादों का सफ़र

Posted On: 7 Feb, 2013 Others में

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एक उम्र बीत गयी पहचान बनाते बनाते
आज लोगो ने पहचाना तो हम खुद को भूल गए.

दिल पे जाने क्यों दस्तक देता है मेरा बचपन
कुछ देर को दरवाज़ा खोल तो आंसू निकल गए.

जब तक चलता रहा अंगारों पर,चेहरे पे शिकन न थी
आज दो पल फुर्सत के क्या मिले,पुराने जख्म उभर गए.

दुनिया की रफ़्तार से कदम मिलाते हुए निकल गए बहुत आगे
आज लगा की मंजिल करीब है,मगर अपने तो भीड़ में ही बिछड़ गए…

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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Malik Parveen के द्वारा
February 13, 2013

इस भीड़ भरी दुनिया में हर कोई अकेला है , जानता है बस वही जिसने ये सब झेला है ,

    deepak khanduri के द्वारा
    February 24, 2013

    absolutely right parveen ji

harirawat के द्वारा
February 11, 2013

दीपक जी यादों के झरोखों से झाँखने पर चक्षुवों से अश्रु बिंदु झलकने लगे, सूखे पत्ते वृक्षों से टूट टूट कर दूर जाने लगे, दिल की गहराइयों से बचपन कि यादों की एक मधुर स्मृति लौ बनकर आँखों के आगे झिलमिलाने लगे, ठीक वही अहसाश मुझको हुआ आपकी कविता पढ़कर ! बहुत सुन्दर दिल से निकले हुए उदगार !

    deepakk के द्वारा
    February 12, 2013

    बहुत धन्यवाद् रावत सर…आपका आशीर्वाद बना रहे

chaatak के द्वारा
February 8, 2013

मेरे दिल के किसी कोने में इक मासूम सा बच्चा, बड़ों की देखकर दुनिया- बड़ा होने से डरता है !!!


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